श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.57

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

दह्यमानेऽग्‍निभिर्देहे पत्युः पत्‍नी सहोटजे।

बहिः स्थिता पतिं साध्वी तमग्‍निमनुवेक्ष्यति॥ ५७

dahyamāne'gnibhirdehe patyuḥ patnī sahoṭaje|

bahiḥ sthitā patiṃ sādhvī tamagnimanuvekṣyati|| 57

अर्थ

गार्हपत्यादि अग्‍नियोंके द्वारा पर्णकुटीके साथ अपने पतिके मृतदेहको जलते देखकर बाहर खड़ी हुई साध्वी गान्धारी भी पतिका अनुगमन करती हुई उसी आगमें प्रवेश कर जायँगी॥ ५७॥✎ 92

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #92 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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