विद्वन्! आप भगवान्को ही अपने जीवनका ध्रुवतारा मानते हैं। इसलिये आप सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय भगवान्के उदार और विशुद्ध चरित्रोंका हम श्रद्धालु श्रोताओंके लिये विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १५॥✎ 110111
तन्नो भवान् वै भगवत्प्रधानो
महत्तमैकान्तपरायणस्य ।
हरेरुदारं चरितं विशुद्धं
शुश्रूषतां नो वितनोतु विद्वन्॥ १५
विद्वन्! आप भगवान्को ही अपने जीवनका ध्रुवतारा मानते हैं। इसलिये आप सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय भगवान्के उदार और विशुद्ध चरित्रोंका हम श्रद्धालु श्रोताओंके लिये विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 170) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/15/