श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.15

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तन्‍नो१ भवान् वै भगवत्प्रधानो

महत्तमैकान्तपरायणस्य ।

हरेरुदारं चरितं विशुद्धं

शुश्रूषतां नो वितनोतु विद्वन्२॥ १५

tanno bhavān vai bhagavatpradhāno

mahattamaikāntaparāyaṇasya |

harerudāraṃ caritaṃ viśuddhaṃ

śuśrūṣatāṃ no vitanotu vidvan|| 15

अर्थ

विद्वन्! आप भगवान्‌को ही अपने जीवनका ध्रुवतारा मानते हैं। इसलिये आप सत्पुरुषोंके एकमात्र आश्रय भगवान्‌के उदार और विशुद्ध चरित्रोंका हम श्रद्धालु श्रोताओंके लिये विस्तारसे वर्णन कीजिये॥ १५॥✎ 110 111

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—ततो।

    (मुद्रित पृष्ठ 170)
  2. २

    प्रा० पा०—विद्वान्।

    (मुद्रित पृष्ठ 170)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #110 शब्दोंके बीचका स्थान: कोही → को ही
  • #111 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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