श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.16

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स वै महाभागवतः परीक्षिद्

येनापवर्गाख्यमदभ्रबुद्धिः ।

ज्ञानेन वैयासकिशब्दितेन

भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम्॥ १६

sa vai mahābhāgavataḥ parīkṣid

yenāpavargākhyamadabhrabuddhiḥ |

jñānena vaiyāsakiśabditena

bheje khagendradhvajapādamūlam|| 16

अर्थ

भगवान्‌के परम प्रेमी महाबुद्धि परीक्षित‍्ने श्रीशुकदेवजीके उपदेश किये हुए जिस ज्ञानसे मोक्षस्वरूप भगवान्‌के चरणकमलोंको प्राप्त किया, आप कृपा करके उसी ज्ञान और परीक्षित‍्के परम पवित्र उपाख्यानका वर्णन कीजिये; क्योंकि उसमें कोई बात छिपाकर नहीं कही गयी होगी और भगवत्प्रेमकी अद्भुत योगनिष्ठाका निरूपण किया गया होगा। उसमें पद-पदपर भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका वर्णन हुआ होगा। भगवान्‌के प्यारे भक्तोंको वैसा प्रसंग सुननेमें बड़ा रस मिलता है॥ १६-१७॥✎ 110 111

यह अर्थ श्लोक 16–17 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #110 शब्दोंके बीचका स्थान: कोही → को ही
  • #111 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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