श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

एतावतालं ननु३ सूचितेन

गुणैरसाम्या४नतिशायनस्य ।

हित्वेतरान् प्रार्थयतो विभूति-

र्यस्याङ्‌घ्रिरेणुं जुषतेऽनभीप्सोः॥ २०

etāvatālaṃ nanu sūcitena

guṇairasāmyānatiśāyanasya |

hitvetarān prārthayato vibhūti-

ryasyāṅghrireṇuṃ juṣate'nabhīpsoḥ|| 20

अर्थ

भगवान्‌के गुणोंकी समता भी जब कोई नहीं कर सकता, तब उनसे बढ़कर तो कोई हो ही कैसे सकता है। उनके गुणोंकी यह विशेषता समझानेके लिये इतना कह देना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मीजी अपनेको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रार्थना करनेवाले ब्रह्मादि देवताओंको छोड़कर भगवान्‌के न चाहनेपर भी उनके चरणकमलोंकी रजका ही सेवन करती हैं॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—बत।

    (मुद्रित पृष्ठ 170)
  2. ४

    प्रा० पा०—रसाम्यैरति०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 170)

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