ब्रह्माजीने भगवान्के चरणोंका प्रक्षालन करनेके लिये जो जल समर्पित किया था, वही उनके चरणनखोंसे निकलकर गंगाजीके रूपमें प्रवाहित हुआ। यह जल महादेवजीसहित सारे जगत्को पवित्र करता है। ऐसी अवस्थामें त्रिभुवनमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त ‘भगवान्’ शब्दका दूसरा और क्या अर्थ हो सकता है॥ २१॥
अथापि यत्पादनखावसृष्टं
जगद्विरिञ्चोपहृतार्हणाम्भः ।
सेशं पुनात्यन्यतमो मुकुन्दात्
को नाम लोके भगवत्पदार्थः॥ २१
ब्रह्माजीने भगवान्के चरणोंका प्रक्षालन करनेके लिये जो जल समर्पित किया था, वही उनके चरणनखोंसे निकलकर गंगाजीके रूपमें प्रवाहित हुआ। यह जल महादेवजीसहित सारे जगत्को पवित्र करता है। ऐसी अवस्थामें त्रिभुवनमें श्रीकृष्णके अतिरिक्त ‘भगवान्’ शब्दका दूसरा और क्या अर्थ हो सकता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 171) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/21/