‘ये नरपति कहलानेवाले लोग उच्छिष्टभोजी कौओंके समान संड-मुसंड होकर कितना अन्याय करने लगे हैं! ब्राह्मणोंके दास होकर भी ये दरवाजेपर पहरा देनेवाले कुत्तेके समान अपने स्वामीका ही तिरस्कार करते हैं ॥ ३३॥
अहो अधर्मः पालानां पीन्नां बलिभुजामिव।
स्वामिन्यघं यद् दासानां द्वारपानां शुनामिव॥ ३३
‘ये नरपति कहलानेवाले लोग उच्छिष्टभोजी कौओंके समान संड-मुसंड होकर कितना अन्याय करने लगे हैं! ब्राह्मणोंके दास होकर भी ये दरवाजेपर पहरा देनेवाले कुत्तेके समान अपने स्वामीका ही तिरस्कार करते हैं ॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 172) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/33/