॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.18.44
तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं
यन्नष्टनाथस्य वसोर्विलुम्पकात्।
परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते
पशून स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः॥ ४४
tadadya naḥ pāpamupaityananvayaṃ
yannaṣṭanāthasya vasorvilumpakāt|
parasparaṃ ghnanti śapanti vṛñjate
paśūna striyo'rthān purudasyavo janāḥ|| 44
अर्थ
राजाके नष्ट हो जानेपर धन आदि चुरानेवाले चोर जो पाप करेंगे, उसके साथ हमारा कोई सम्बन्ध न होनेपर भी वह हमपर भी लागू होगा। क्योंकि राजाके न रहनेपर लुटेरे बढ़ जाते हैं और वे आपसमें मार-पीट, गाली-गलौज करते हैं, साथ ही पशु, स्त्री और धन-सम्पत्ति भी लूट लेते हैं॥ ४४॥