श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.45

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तदाऽऽर्यधर्मश्‍च विलीयते नृणां

वर्णाश्रमाचारयुतस्त्रयीमयः ।

ततोऽर्थकामाभिनिवेशितात्मनां

शुनां कपीनामिव वर्णसङ्करः॥ ४५

tadā''ryadharmaśca vilīyate nṛṇāṃ

varṇāśramācārayutastrayīmayaḥ |

tato'rthakāmābhiniveśitātmanāṃ

śunāṃ kapīnāmiva varṇasaṅkaraḥ|| 45

अर्थ

उस समय मनुष्योंका वर्णाश्रमाचार-युक्त वैदिक आर्यधर्म लुप्त हो जाता है, अर्थ-लोभ और काम-वासनाके विवश होकर लोग कुत्तों और बंदरोंके समान वर्णसंकर हो जाते हैं॥ ४५॥

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