श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.46

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

धर्मपालो नरपतिः स तु सम्राड् बृहच्छ्रवाः।

साक्षान्महाभागवतो राजर्षिर्हयमेधयाट्।

क्षुत्तृट्श्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति॥ ४६

dharmapālo narapatiḥ sa tu samrāḍ bṛhacchravāḥ|

sākṣānmahābhāgavato rājarṣirhayamedhayāṭ|

kṣuttṛṭśramayuto dīno naivāsmacchāpamarhati|| 46

अर्थ

सम्राट् परीक्षित् तो बड़े ही यशस्वी और धर्मधुरन्धर हैं। उन्होंने बहुत-से अश्‍वमेध यज्ञ किये हैं और वे भगवान्‌के परम प्यारे भक्त हैं; वे ही राजर्षि भूख-प्याससे व्याकुल होकर हमारे आश्रमपर आये थे, वे शापके योग्य कदापि नहीं हैं॥ ४६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें