श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.7

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

नानुद्वेष्टि १ कलिं सम्राट् सारङ्ग इव सारभुक्।

कुशलान्याशु सिद्ध्यन्ति नेतराणि कृतानि यत्॥ ७

nānudveṣṭi kaliṃ samrāṭ sāraṅga iva sārabhuk|

kuśalānyāśu siddhyanti netarāṇi kṛtāni yat|| 7

अर्थ

भ्रमरके समान सारग्राही सम्राट् परीक्षित् कलियुगसे कोई द्वेष नहीं रखते थे; क्योंकि इसमें यह एक बहुत बड़ा गुण है कि पुण्यकर्म तो संकल्पमात्रसे ही फलीभूत हो जाते हैं, परन्तु पापकर्मका फल शरीरसे करनेपर ही मिलता है; संकल्पमात्रसे नहीं॥ ७॥✎ 109

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—नाभि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 169)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #109 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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