श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.8

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

किं नु बालेषु शूरेण कलिना धीरभीरुणा।

अप्रमत्तः प्रमत्तेषु यो वृको२ नृषु वर्तते॥ ८

kiṃ nu bāleṣu śūreṇa kalinā dhīrabhīruṇā|

apramattaḥ pramatteṣu yo vṛko nṛṣu vartate|| 8

अर्थ

यह भेड़ियेके समान बालकोंके प्रति शूरवीर और धीर वीर पुरुषोंके लिये बड़ा भीरु है। यह प्रमादी मनुष्योंको अपने वशमें करनेके लिये ही सदा सावधान रहता है॥ ८॥✎ 109

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—नृपो।

    (मुद्रित पृष्ठ 169)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #109 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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