श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.13

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

राजोवाच

अहो वयं धन्यतमा नृपाणां

महत्तमानुग्रहणीयशीलाः ।

राज्ञां कुलं ब्राह्मणपादशौचाद्

दूराद् विसृष्टं बत गर्ह्यकर्म॥ १३

aho vayaṃ dhanyatamā nṛpāṇāṃ

mahattamānugrahaṇīyaśīlāḥ |

rājñāṃ kulaṃ brāhmaṇapādaśaucād

dūrād visṛṣṭaṃ bata garhyakarma|| 13

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने कहा—अहो! समस्त राजाओंमें हम धन्य हैं। धन्यतम हैं; क्योंकि अपने शील-स्वभावके कारण हम आप महापुरुषोंके कृपापात्र बन गये हैं। राजवंशके लोग प्रायः निन्दित कर्म करनेके कारण ब्राह्मणोंके चरण-धोवनसे दूर पड़ जाते हैं—यह कितने खेदकी बात है॥ १३॥

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