श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तस्यैव मेऽघस्य परावरेशो

व्यासक्तचित्तस्य गृहेष्वभीक्ष्णम्।

निर्वेदमूलो द्विजशापरूपो

यत्र प्रसक्तो भयमाशु धत्ते॥ १४

tasyaiva me'ghasya parāvareśo

vyāsaktacittasya gṛheṣvabhīkṣṇam|

nirvedamūlo dvijaśāparūpo

yatra prasakto bhayamāśu dhatte|| 14

अर्थ

मैं भी राजा ही हूँ। निरन्तर देह-गेहमें आसक्त रहनेके कारण मैं भी पापरूप ही हो गया हूँ। इसीसे स्वयं भगवान् ही ब्राह्मणके शापके रूपमें मुझपर कृपा करनेके लिये पधारे हैं। यह शाप वैराग्य उत्पन्‍न करनेवाला है। क्योंकि इस प्रकारके शापसे संसारासक्त पुरुष भयभीत होकर विरक्त हो जाया करते हैं॥ १४॥

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