अवश्य ही उन महात्माके अपमानके फलस्वरूप शीघ्र-से-शीघ्र मुझपर कोई घोर विपत्ति आवेगी। मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ; क्योंकि उससे मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जायगा और फिर कभी मैं ऐसा काम करनेका दुःसाहस नहीं करूँगा॥ २॥
ध्रुवं ततो मे कृतदेवहेलनाद्
दुरत्ययं व्यसनं नातिदीर्घात्।
तदस्तु कामं त्वघनिष्कृताय मे
यथा न कुर्यां पुनरेवमद्धा॥ २
अवश्य ही उन महात्माके अपमानके फलस्वरूप शीघ्र-से-शीघ्र मुझपर कोई घोर विपत्ति आवेगी। मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ; क्योंकि उससे मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जायगा और फिर कभी मैं ऐसा काम करनेका दुःसाहस नहीं करूँगा॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.19.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 174) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/19/2/