इसलिये एकाग्र मनसे भक्तवत्सल भगवान्का ही नित्य-निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिये॥ १४॥✎ 26
तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा॥ १४
इसलिये एकाग्र मनसे भक्तवत्सल भगवान्का ही नित्य-निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिये॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 86) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/2/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)