॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.2.27
रजस्तमःप्रकृतयः समशीला भजन्ति वै।
पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः॥ २७
rajastamaḥprakṛtayaḥ samaśīlā bhajanti vai|
pitṛbhūtaprajeśādīn śriyaiśvaryaprajepsavaḥ|| 27
अर्थ
परन्तु जिसका स्वभाव रजोगुणी अथवा तमोगुणी है, वे धन, ऐश्वर्य और संतानकी कामनासे भूत, पितर और प्रजापतियोंकी उपासना करते हैं; क्योंकि इन लोगोंका स्वभाव उन (भूतादि)-से मिलता-जुलता होता है॥ २७॥