श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.3

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-

मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम्।

संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं

तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम्॥ ३

yaḥ svānubhāvamakhilaśrutisārameka-

madhyātmadīpamatititīrṣatāṃ tamo'ndham|

saṃsāriṇāṃ karuṇayā''ha purāṇaguhyaṃ

taṃ vyāsasūnumupayāmi guruṃ munīnām|| 3

अर्थ

यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय—रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है। संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करानेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है। वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े-बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है। मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ ३॥✎ 1276

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1276 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीमद्भागवत-महापुराणका → श्रीमद्भागवतमहापुराणका

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