धर्मका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेपर भी यदि मनुष्यके हृदयमें भगवान्की लीला-कथाओंके प्रति अनुरागका उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है॥ ८॥✎ 25
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥ ८
धर्मका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेपर भी यदि मनुष्यके हृदयमें भगवान्की लीला-कथाओंके प्रति अनुरागका उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 85) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/2/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)