श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

धान्वन्तरं द्वादशमं त्रयोदशममेव च।

अपाययत्सुरानन्यान्मोहिन्या मोहयन् स्त्रिया॥ १७

dhānvantaraṃ dvādaśamaṃ trayodaśamameva ca|

apāyayatsurānanyānmohinyā mohayan striyā|| 17

अर्थ

बारहवीं बार धन्वन्तरिके रूपमें अमृत लेकर समुद्रसे प्रकट हुए और तेरहवीं बार मोहिनीरूप धारण करके दैत्योंको मोहित करते हुए देवताओंको अमृत पिलाया॥ १७॥✎ 30 31

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #30 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #31 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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