श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

चतुर्दशं नारसिंहं बिभ्रद्दैत्येन्द्रमूर्जितम्।

ददार करजैर्वक्षस्येरकां कटकृद्यथा॥ १८

caturdaśaṃ nārasiṃhaṃ bibhraddaityendramūrjitam|

dadāra karajairvakṣasyerakāṃ kaṭakṛdyathā|| 18

अर्थ

चौदहवें अवतारमें उन्होंने नरसिंहरूप धारण किया और अत्यन्त बलवान् दैत्यराज हिरण्यकशिपुकी छाती अपने नखोंसे अनायास इस प्रकार फाड़ डाली, जैसे चटाई बनानेवाला सींकको चीर डालता है॥ १८॥✎ 30 31

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #30 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #31 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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