श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.26

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः।

यथाविदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः॥ २६

avatārā hyasaṃkhyeyā hareḥ sattvanidherdvijāḥ|

yathāvidāsinaḥ kulyāḥ sarasaḥ syuḥ sahasraśaḥ|| 26

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! जैसे अगाध सरोवरसे हजारों छोटे-छोटे नाले निकलते हैं, वैसे ही सत्त्वनिधि भगवान् श्रीहरिके असंख्य अवतार हुआ करते हैं॥ २६॥

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