श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा।

अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम्॥ ३३

yatreme sadasadrūpe pratiṣiddhe svasaṃvidā|

avidyayā''tmani kṛte iti tadbrahmadarśanam|| 33

अर्थ

उपर्युक्त सूक्ष्म और स्थूलशरीर अविद्यासे ही आत्मामें आरोपित हैं। जिस अवस्थामें आत्मस्वरूपके ज्ञानसे यह आरोप दूर हो जाता है, उसी समय ब्रह्मका साक्षात्कार होता है॥ ३३॥

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