श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः।

सम्पन्‍न एवेति विदुर्महिम्नि स्वे महीयते॥ ३४

yadyeṣoparatā devī māyā vaiśāradī matiḥ|

sampanna eveti vidurmahimni sve mahīyate|| 34

अर्थ

तत्त्वज्ञानी लोग जानते हैं कि जिस समय यह बुद्धिरूपा परमेश्‍वरकी माया निवृत्त हो जाती है, उस समय जीव परमानन्दमय हो जाता है और अपनी स्वरूप-महिमामें प्रतिष्ठित होता है॥ ३४॥

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