श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.8

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तृतीयमृषिसर्गं च देवर्षित्वमुपेत्य सः।

तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः॥ ८

tṛtīyamṛṣisargaṃ ca devarṣitvamupetya saḥ|

tantraṃ sātvatamācaṣṭa naiṣkarmyaṃ karmaṇāṃ yataḥ|| 8

अर्थ

ऋषियोंकी सृष्टिमें उन्होंने देवर्षि नारदके रूपमें तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तन्त्रका (जिसे ‘नारद-पांचरात्र’ कहते हैं) उपदेश किया; उसमें कर्मोंके द्वारा किस प्रकार कर्मबन्धनसे मुक्ति मिलती है, इसका वर्णन है॥ ८॥✎ 29

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #29 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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