धर्मपत्नी मूर्तिके गर्भसे उन्होंने नर-नारायणके रूपमें चौथा अवतार ग्रहण किया। इस अवतारमें उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियोंका सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की॥ ९॥✎ 29
तुर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी।
भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद् दुश्चरं तपः॥ ९
धर्मपत्नी मूर्तिके गर्भसे उन्होंने नर-नारायणके रूपमें चौथा अवतार ग्रहण किया। इस अवतारमें उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियोंका सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.3.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 89) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/3/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)