श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.10

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स सम्राट् कस्य वा हेतोः पाण्डूनां मानवर्धनः।

प्रायोपविष्टो गङ्गायामनादृत्याधिराट्श्रियम्॥ १०

sa samrāṭ kasya vā hetoḥ pāṇḍūnāṃ mānavardhanaḥ|

prāyopaviṣṭo gaṅgāyāmanādṛtyādhirāṭśriyam|| 10

अर्थ

वे तो पाण्डव-वंशके गौरव बढ़ानेवाले सम्राट् थे। वे भला, किस कारणसे साम्राज्यलक्ष्मीका परित्याग करके गंगातटपर मृत्युपर्यन्त अनशनका व्रत लेकर बैठे थे?॥ १०॥✎ 1278 1279

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1278 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पाण्डव-नन्दन → पाण्डवनन्दन
  • #1279 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नगर-वासियोंने → नगरवासियोंने

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