श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.16

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

परावरज्ञः स ऋषिः कालेनाव्यक्तरंहसा।

युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे॥ १६

parāvarajñaḥ sa ṛṣiḥ kālenāvyaktaraṃhasā|

yugadharmavyatikaraṃ prāptaṃ bhuvi yuge yuge|| 16

अर्थ

महर्षि भूत और भविष्यको जानते थे। उनकी दृष्टि अचूक थी। उन्होंने देखा कि जिसको लोग जान नहीं पाते, ऐसे समयके फेरसे प्रत्येक युगमें धर्मसंकरता और उसके प्रभावसे भौतिक वस्तुओंकी भी शक्तिका ह्रास होता रहता है। संसारके लोग श्रद्धाहीन और शक्तिरहित हो जाते हैं। उनकी बुद्धि कर्तव्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाती और आयु भी कम हो जाती है। लोगोंकी इस भाग्यहीनताको देखकर उन मुनीश्‍वरने अपनी दिव्यदृष्टिसे समस्त वर्णों और आश्रमोंका हित कैसे हो, इसपर विचार किया॥ १६—१८॥

यह अर्थ श्लोक 16–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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