श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.21

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तत्रर्ग्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः।

वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामुत॥ २१

tatrargvedadharaḥ pailaḥ sāmago jaiminiḥ kaviḥ|

vaiśampāyana evaiko niṣṇāto yajuṣāmuta|| 21

अर्थ

उनमेंसे ऋग्वेदके पैल, सामगानके विद्वान् जैमिनि एवं यजुर्वेदके एकमात्र स्नातक वैशम्पायन हुए॥ २१॥ अथर्ववेदमें प्रवीण हुए दरुणनन्दन सुमन्तु मुनि। इतिहास और पुराणोंके स्नातक मेरे पिता रोमहर्षण थे॥ २२॥ इन पूर्वोक्त ऋषियोंने अपनी-अपनी शाखाको और भी अनेक भागोंमें विभक्त कर दिया। इस प्रकार शिष्य, प्रशिष्य और उनके शिष्योंद्वारा वेदोंकी बहुत-सी शाखाएँ बन गयीं॥ २३॥ कम समझवाले पुरुषोंपर कृपा करके भगवान् वेदव्यासने इसलिये ऐसा विभाग कर दिया कि जिन लोगोंको स्मरणशक्ति नहीं है या कम है, वे भी वेदोंको धारण कर सकें॥ २४॥

यह व्याख्या श्लोक 1.4.21 से 1.4.24 तककी एक साथ है।

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