उनका मन कुछ खिन्न-सा हो गया। सरस्वती नदीके पवित्र तटपर एकान्तमें बैठकर धर्मवेत्ता व्यासजी मन-ही-मन विचार करते हुए इस प्रकार कहने लगे—॥ २७॥✎ 36373839
नातिप्रसीदद्धृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ।
वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं प्रोवाच धर्मवित्॥ २७
उनका मन कुछ खिन्न-सा हो गया। सरस्वती नदीके पवित्र तटपर एकान्तमें बैठकर धर्मवेत्ता व्यासजी मन-ही-मन विचार करते हुए इस प्रकार कहने लगे—॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.4.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 96) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/4/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)