‘मैंने निष्कपटभावसे ब्रह्मचर्यादि व्रतोंका पालन करते हुए वेद, गुरुजन और अग्नियोंका सम्मान किया है और उनकी आज्ञाका पालन किया है॥ २८॥✎ 36373839
धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः।
मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम्॥ २८
‘मैंने निष्कपटभावसे ब्रह्मचर्यादि व्रतोंका पालन करते हुए वेद, गुरुजन और अग्नियोंका सम्मान किया है और उनकी आज्ञाका पालन किया है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.4.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 96) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/4/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)