श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

इदं हि विश्‍वं भगवानिवेतरो

यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवाः।

तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि वै१

प्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम्॥ २०

idaṃ hi viśvaṃ bhagavānivetaro

yato jagatsthānanirodhasambhavāḥ|

taddhi svayaṃ veda bhavāṃstathāpi vai

prādeśamātraṃ bhavataḥ pradarśitam|| 20

अर्थ

जिनसे जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं, वे भगवान् ही इस विश्‍वके रूपमें भी हैं। ऐसा होनेपर भी वे इससे विलक्षण हैं। इस बातको आप स्वयं जानते हैं, तथापि मैंने आपको संकेतमात्र कर दिया है॥ २०॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—ते प्रदेश०।

    (मुद्रित पृष्ठ 100)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)
  • #40 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #41 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #42 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #43 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #44 शब्दोंके बीचका स्थान: कोअर्पण → को अर्पण
  • #45 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #46 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1571 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान्‌के → पुरुषोत्तमभगवान्‌के
  • #1572 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अचिन्त्य-शक्ति → अचिन्त्यशक्ति

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