व्यासजी! आपकी दृष्टि अमोघ है; आप इस बातको जानिये कि आप पुरुषोत्तमभगवान्के कलावतार हैं। आपने अजन्मा होकर भी जगत्के कल्याणके लिये जन्म ग्रहण किया है। इसलिये आप विशेषरूपसे भगवान्की लीलाओंका कीर्तन कीजिये॥ २१॥✎ 4041424344454615711572
त्वमात्मनाऽऽत्मानमवेह्यमोघदृक्
परस्य पुंसः परमात्मनः कलाम्।
अजं प्रजातं जगतः शिवाय त-
न्महानुभावाभ्युदयोऽधिगण्यताम्॥ २१
व्यासजी! आपकी दृष्टि अमोघ है; आप इस बातको जानिये कि आप पुरुषोत्तमभगवान्के कलावतार हैं। आपने अजन्मा होकर भी जगत्के कल्याणके लिये जन्म ग्रहण किया है। इसलिये आप विशेषरूपसे भगवान्की लीलाओंका कीर्तन कीजिये॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.5.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 100) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/5/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)