श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.22

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा

स्विष्टस्य सूक्तस्य च बु२द्धिदत्तयोः।

अविच्युतोऽर्थः कविभिर्निरूपितो

यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम्३॥ २२

idaṃ hi puṃsastapasaḥ śrutasya vā

sviṣṭasya sūktasya ca buddhidattayoḥ|

avicyuto'rthaḥ kavibhirnirūpito

yaduttamaślokaguṇānuvarṇanam|| 22

अर्थ

विद्वानोंने इस बातका निरूपण किया है कि मनुष्यकी तपस्या, वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान, स्वाध्याय, ज्ञान और दानका एकमात्र प्रयोजन यही है कि पुण्यकीर्ति श्रीकृष्णके गुणों और लीलाओंका वर्णन किया जाय॥ २२॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—बुद्ध०।

    (मुद्रित पृष्ठ 100)
  2. ३

    प्रा० पा०—गुणानुकीर्तनम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 100)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)
  • #40 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #41 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #42 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #43 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #44 शब्दोंके बीचका स्थान: कोअर्पण → को अर्पण
  • #45 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #46 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1571 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान्‌के → पुरुषोत्तमभगवान्‌के
  • #1572 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अचिन्त्य-शक्ति → अचिन्त्यशक्ति

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