श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

उच्छिष्टलेपाननुमोदितो द्विजैः

सकृत्स्म भुञ्जे तदपास्तकिल्बिषः।

एवं प्रवृत्तस्य विशुद्धचेतस-

स्तद्धर्म एवात्मरुचिः प्रजायते॥ २५

ucchiṣṭalepānanumodito dvijaiḥ

sakṛtsma bhuñje tadapāstakilbiṣaḥ|

evaṃ pravṛttasya viśuddhacetasa-

staddharma evātmaruciḥ prajāyate|| 25

अर्थ

उनकी अनुमति प्राप्त करके बरतनोंमें लगा हुआ प्रसाद मैं एक बार खा लिया करता था। इससे मेरे सारे पाप धुल गये। इस प्रकार उनकी सेवा करते-करते मेरा हृदय शुद्ध हो गया और वे लोग जैसा भजन-पूजन करते थे, उसीमें मेरी भी रुचि हो गयी॥ २५॥✎ 47

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #47 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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