श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.24

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ते मय्यपेताखिलचापलेऽर्भके

दान्तेऽधृतक्रीडनकेऽनुवर्तिनि ।

चक्रुः कृपां यद्यपि तुल्यदर्शनाः

शुश्रूषमाणे मुनयोऽल्पभाषिणि॥ २४

te mayyapetākhilacāpale'rbhake

dānte'dhṛtakrīḍanake'nuvartini |

cakruḥ kṛpāṃ yadyapi tulyadarśanāḥ

śuśrūṣamāṇe munayo'lpabhāṣiṇi|| 24

अर्थ

मैं यद्यपि बालक था, फिर भी किसी प्रकारकी चंचलता नहीं करता था, जितेन्द्रिय था, खेल-कूदसे दूर रहता था और आज्ञानुसार उनकी सेवा करता था। मैं बोलता भी बहुत कम था। मेरे इस शील-स्वभावको देखकर समदर्शी मुनियोंने मुझ सेवकपर अत्यन्त अनुग्रह किया॥ २४॥✎ 47

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #47 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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