इस प्रकार जो पुरुष चतुर्व्यूहरूपी भगवन्मूर्तियोंके नामद्वारा प्राकृतमूर्तिरहित अप्राकृत मन्त्रमूर्ति भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन करता है, उसीका ज्ञान पूर्ण एवं यथार्थ है॥ ३८॥✎ 505152
इति मूर्त्यभिधानेन मन्त्रमूर्तिममूर्तिकम्।
यजते यज्ञपुरुषं स सम्यग्दर्शनः पुमान्॥ ३८
इस प्रकार जो पुरुष चतुर्व्यूहरूपी भगवन्मूर्तियोंके नामद्वारा प्राकृतमूर्तिरहित अप्राकृत मन्त्रमूर्ति भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन करता है, उसीका ज्ञान पूर्ण एवं यथार्थ है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.5.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 102) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/5/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)