श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.7

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वं पर्यटन्‍नर्क इव त्रिलोकी-

मन्तश्‍चरो वायुरिवात्मसाक्षी।

परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैः

स्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व॥ ७

tvaṃ paryaṭannarka iva trilokī-

mantaścaro vāyurivātmasākṣī|

parāvare brahmaṇi dharmato vrataiḥ

snātasya me nyūnamalaṃ vicakṣva|| 7

अर्थ

आप सूर्यकी भाँति तीनों लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं और योगबलसे प्राणवायुके समान सबके भीतर रहकर अन्तःकरणोंके साक्षी भी हैं। योगानुष्ठान और नियमोंके द्वारा परब्रह्म और शब्दब्रह्म दोनोंकी पूर्ण प्राप्ति कर लेनेपर भी मुझमें जो बड़ी कमी है, उसे आप कृपा करके बतलाइये॥ ७॥

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