स्नात्वा पीत्वा ह्रदे नद्या उपस्पृष्टो गतश्रमः॥ १५
pariśrāntendriyātmāhaṃ tṛṭparīto bubhukṣitaḥ|
snātvā pītvā hrade nadyā upaspṛṣṭo gataśramaḥ|| 15
अर्थ
चलते-चलते मेरा शरीर और इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं। मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी, भूखा तो था ही। वहाँ एक नदी मिली। उसके कुण्डमें मैंने स्नान, जलपान और आचमन किया। इससे मेरी थकावट मिट गयी॥ १५॥
परिश्रान्तेन्द्रियात्माहं तृट्परीतो बुभुक्षितः।
स्नात्वा पीत्वा ह्रदे नद्या उपस्पृष्टो गतश्रमः॥ १५
चलते-चलते मेरा शरीर और इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं। मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी, भूखा तो था ही। वहाँ एक नदी मिली। उसके कुण्डमें मैंने स्नान, जलपान और आचमन किया। इससे मेरी थकावट मिट गयी॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 104) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/6/15/