उस विजन वनमें एक पीपलके नीचे आसन लगाकर मैं बैठ गया। उन महात्माओंसे जैसा मैंने सुना था, हृदयमें रहनेवाले परमात्माके उसी स्वरूपका मैं मन-ही-मन ध्यान करने लगा॥ १६॥
तस्मिन्निर्मनुजेऽरण्ये पिप्पलोपस्थ आस्थितः।
आत्मनाऽऽत्मानमात्मस्थं यथाश्रुतमचिन्तयम्॥ १६
उस विजन वनमें एक पीपलके नीचे आसन लगाकर मैं बैठ गया। उन महात्माओंसे जैसा मैंने सुना था, हृदयमें रहनेवाले परमात्माके उसी स्वरूपका मैं मन-ही-मन ध्यान करने लगा॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 104) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/6/16/