इस प्रकार निर्जन वनमें मुझे प्रयत्न करते देख स्वयं भगवान्ने, जो वाणीके विषय नहीं हैं, बड़ी गंभीर और मधुर वाणीसे मेरे शोकको शान्त करते हुए-से कहा॥ २१॥✎ 555657
एवं यतन्तं विजने मामाहागोचरो गिराम्।
गम्भीरश्लक्ष्णया वाचा शुचः प्रशमयन्निव॥ २१
इस प्रकार निर्जन वनमें मुझे प्रयत्न करते देख स्वयं भगवान्ने, जो वाणीके विषय नहीं हैं, बड़ी गंभीर और मधुर वाणीसे मेरे शोकको शान्त करते हुए-से कहा॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 104) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/6/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)