श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.22

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

हन्तास्मिञ्जन्मनि भवान्मा मां द्रष्टुमिहार्हति।

अविपक्‍वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम्॥ २२

hantāsmiñjanmani bhavānmā māṃ draṣṭumihārhati|

avipakvakaṣāyāṇāṃ durdarśo'haṃ kuyoginām|| 22

अर्थ

‘खेद है कि इस जन्ममें तुम मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे। जिनकी वासनाएँ पूर्णतया शान्त नहीं हो गयीं हैं, उन अधकचरे योगियोंको मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है॥ २२॥✎ 55 56 57

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #55 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसिर → को सिर
  • #56 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #57 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,

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