जिन लोगोंका चित्त निरन्तर विषयभोगोंकी कामनासे आतुर हो रहा है, उनके लिये भगवान्की लीलाओंका कीर्तन संसारसागरसे पार जानेका जहाज है, यह मेरा अपना अनुभव है॥ ३५॥✎ 5859606112801281
एतद्ध्यातुरचित्तानां मात्रास्पर्शेच्छया मुहुः।
भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम्॥ ३५
जिन लोगोंका चित्त निरन्तर विषयभोगोंकी कामनासे आतुर हो रहा है, उनके लिये भगवान्की लीलाओंका कीर्तन संसारसागरसे पार जानेका जहाज है, यह मेरा अपना अनुभव है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 106) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/6/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)