श्रीसूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! देवर्षि नारदने व्यासजीसे इस प्रकार कहकर जानेकी अनुमति ली और वीणा बजाते हुए स्वच्छन्द विचरण करनेके लिये वे चल पड़े॥ ३८॥✎ 62
एवं सम्भाष्य भगवान्नारदो वासवीसुतम्।
आमन्त्र्य वीणां रणयन् ययौ यादृच्छिको मुनिः॥ ३८
श्रीसूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! देवर्षि नारदने व्यासजीसे इस प्रकार कहकर जानेकी अनुमति ली और वीणा बजाते हुए स्वच्छन्द विचरण करनेके लिये वे चल पड़े॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 106) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/6/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)