व्यासजी! आप निष्पाप हैं। आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब अपने जन्म और साधनाका रहस्य तथा आपकी आत्मतुष्टिका उपाय मैंने बतला दिया॥ ३७॥✎ 5859606112801281
सर्वं तदिदमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वयानघ।
जन्मकर्मरहस्यं मे भवतश्चात्मतोषणम्॥ ३७
व्यासजी! आप निष्पाप हैं। आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब अपने जन्म और साधनाका रहस्य तथा आपकी आत्मतुष्टिका उपाय मैंने बतला दिया॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 106) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/6/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)