श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.10

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सूत उवाच

आत्मारामाश्‍च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।

कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ १०

ātmārāmāśca munayo nirgranthā apyurukrame|

kurvantyahaitukīṃ bhaktimitthambhūtaguṇo hariḥ|| 10

अर्थ

श्रीसूतजीने कहा—जो लोग ज्ञानी हैं, जिनकी अविद्याकी गाँठ खुल गयी है और जो सदा आत्मामें ही रमण करनेवाले हैं, वे भी भगवान्‌की हेतुरहित भक्ति किया करते हैं; क्योंकि भगवान्‌के गुण ही ऐसे मधुर हैं, जो सबको अपनी ओर खींच लेते हैं॥ १०॥✎ 64

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #64 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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