फिर श्रीशुकदेवजी तो भगवान्के भक्तोंके अत्यन्त प्रिय और स्वयं भगवान् वेदव्यासके पुत्र हैं। भगवान्के गुणोंने उनके हृदयको अपनी ओर खींच लिया और उन्होंने उससे विवश होकर ही इस विशाल ग्रन्थका अध्ययन किया॥ ११॥✎ 64
हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः।
अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः॥ ११
फिर श्रीशुकदेवजी तो भगवान्के भक्तोंके अत्यन्त प्रिय और स्वयं भगवान् वेदव्यासके पुत्र हैं। भगवान्के गुणोंने उनके हृदयको अपनी ओर खींच लिया और उन्होंने उससे विवश होकर ही इस विशाल ग्रन्थका अध्ययन किया॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 108) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)