श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः।

अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः॥ ११

harerguṇākṣiptamatirbhagavān bādarāyaṇiḥ|

adhyagānmahadākhyānaṃ nityaṃ viṣṇujanapriyaḥ|| 11

अर्थ

फिर श्रीशुकदेवजी तो भगवान्‌के भक्तोंके अत्यन्त प्रिय और स्वयं भगवान् वेदव्यासके पुत्र हैं। भगवान्‌के गुणोंने उनके हृदयको अपनी ओर खींच लिया और उन्होंने उससे विवश होकर ही इस विशाल ग्रन्थका अध्ययन किया॥ ११॥✎ 64

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #64 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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