अर्जुनकी आँखें क्रोधसे लाल-लाल हो रही थीं। उन्होंने झपटकर उस क्रूर अश्वत्थामाको पकड़ लिया और जैसे कोई रस्सीसे पशुको बाँध ले, वैसे ही बाँध लिया॥ ३३॥✎ 666768
तत आसाद्य तरसा दारुणं गौतमीसुतम्।
बबन्धामर्षताम्राक्षः पशुं रशनया यथा॥ ३३
अर्जुनकी आँखें क्रोधसे लाल-लाल हो रही थीं। उन्होंने झपटकर उस क्रूर अश्वत्थामाको पकड़ लिया और जैसे कोई रस्सीसे पशुको बाँध ले, वैसे ही बाँध लिया॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 110) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/7/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)