उन्होंने भक्तियोगके द्वारा अपने मनको पूर्णतया एकाग्र और निर्मल करके आदिपुरुष परमात्मा और उनके आश्रयसे रहनेवाली मायाको देखा॥ ४॥✎ 1573
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले।
अपश्यत्पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम्॥ ४
उन्होंने भक्तियोगके द्वारा अपने मनको पूर्णतया एकाग्र और निर्मल करके आदिपुरुष परमात्मा और उनके आश्रयसे रहनेवाली मायाको देखा॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 107) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/7/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)