इसी मायासे मोहित होकर यह जीव तीनों गुणोंसे अतीत होनेपर भी अपनेको त्रिगुणात्मक मान लेता है और इस मान्यताके कारण होनेवाले अनर्थोंको भोगता है॥ ५॥✎ 1573
यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम्।
परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतं चाभिपद्यते॥ ५
इसी मायासे मोहित होकर यह जीव तीनों गुणोंसे अतीत होनेपर भी अपनेको त्रिगुणात्मक मान लेता है और इस मान्यताके कारण होनेवाले अनर्थोंको भोगता है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 107) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/7/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)