श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.6

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षजे।

लोकस्याजानतो विद्वांश्‍चक्रे सात्वतसंहिताम्॥ ६

anarthopaśamaṃ sākṣādbhaktiyogamadhokṣaje|

lokasyājānato vidvāṃścakre sātvatasaṃhitām|| 6

अर्थ

इन अनर्थोंकी शान्तिका साक्षात् साधन है—केवल भगवान्‌का भक्तियोग। परन्तु संसारके लोग इस बातको नहीं जानते। यही समझकर उन्होंने इस परमहंसोंकी संहिता श्रीमद्भागवतकी रचना की॥ ६॥✎ 1573

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1573 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्ति-योग। → भक्तियोग।

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